वो जिसे कविताओं से प्यार है

बाहों में संघार लिए,

और आँखों में जीत की कहानियाँ,

चट्टान सा शरीर लिए,

चेहरे अनेक भिड़ंत की निशानियां।

गरज के बोला आदमी,

सुन ले ये सारा ब्रह्मांड,

ना मुझ जैसा शूरवीर कोई,

ना मुझ जैसा कोई महान।

अरे एक नहीं सौ सौ राजाओं को हरा कर आया हूँ,

योद्धा नहीं मैं अनगिनत राज्यों को दबा के आया हूँ।

क्या मानव क्या दानव सबने घुटने मेरे आगे टेके हैं,

क्या त्रिशूल क्या भाले मैंने सारे हथियार भेदे हैं।

कोई नहीं बचा अब इस सारे सौर मंडल में,

जो भीड़ जाने का मुझसे दम रखे,

कोई नहीं रहा दूर दूर तक

जिसके मेरे आगे पैर टिक सकते।

“सच में? क्या सबसे तुम्हारा सामना हो गया?”

“क्या उस स्त्री से भी? जिसे कविताओं से प्यार हो गया?”

कविताओं से प्यार करने वाली?

ये कोई हास्य है क्या?

कोई वीरांगना होती तो समझता,

ये कविता भला कोई हथियार है क्या?

“हथियार नहीं संघार है,

कविता उस स्त्री का श्रृंगार है।

तुमने चला तलवार दुश्मन अपने आधीन किया,

उस स्त्री ने अपनी पंक्तियों में जाने कितनों को क़ैद किया।

उसे दुख दो तो आसुओं को कलम में उतार लेती है,

अपनी किस्मत को पन्नो से विजय गाथा बना देती है,

उसे जो पकड़ ले जाये कोई,

उसकी कविता बेड़ियों की चाभी बन जाए,

उसे जो हराने आए कोई,

उसकी कविता का कायल हो जाए।”

“ज़रा सोचो ये सब तो वो बिना शस्त्र उठाये कर लेती है,

बारिश, आंधी, धूप, छाओं- सबको अपने काव्य में समा लेती है।

वो डरती ही नहीं, उसे डर क्या है,

उसकी कविताई के आगे किसी का बस क्या है।

तुम क्रोध दिखाओगे, वो उसे प्रेम में बदल देगी,

तुम जीतने जाओगे, वो तुम्हें ठहरने को विवश कर देगी।

उसकी बोली में सरस्वती, उसके मन में सितार है,

वो सर्द की मासूम किरन के जैसे,

उसकी निश्छलता ही अभेद्य दीवार है।

उसकी काव्य कला से मोहित सारा जग ही निसार है,

जो तुम्हारे जीवन को कागज़ पे उतार दे,

उससे लड़ना ही बेकार है।”

इस दुनिया में अगर है कोई शक्ति,

तो बस उसके पास है,

बहादूरी है उसके आगे नतमस्तक होना,

वो स्त्री जिसे कविताओं से प्यार है।

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