ऐसा तो नहीं है की मुस्कुराना हम किसी और से सीखे,
गाना हम किसी और से सीखे,
या जीना किसी और से सीखे।
जो हम याद करें अगर तो शायद किसी चिड़िया को देख हम यूँ ही हस दिए थे,
किसी रेडियो की धुन पे हमारे बोल अपने आप ही निकल गए थे,
शायद जब चलना सीखते हुए जब गिरे थे,
ख़ुद से उठना हम यूँ ही सीख गए थे।
ऐसा तो नहीं है की आईने में सजना हमने किसी और के लिए किया,
कोई पुरानी बदरंगी चुन्नी पा कर उसे लपेटना खुदबखुद ही कर लिया,
कोई बिंदी जो शीशे से चिपकी थी, उसे माथे पे खेल खेल में सजा लिया।
और उस रूप में जो शायद अब देख हसेंगे हम,
उस रूप में भी ऐतबार करना हम यूँ ही सीख गए थे।
ऐसा तो नहीं है की अपना मन हम बहला ही नहीं पाते थे,
या पसंद की कोई चीज़ अपनी ले ही नहीं पाते थे,
जो कोहराम हमने कुल्फी ना मिलने पे मचाई है,
जो महोल्ले की नींद हमने स्कूल ना जाने के लिए उड़ाई है।
ऐसा तो नहीं है की ख़ुद के साथ हम ख़ुश नहीं रहते थे,
या कमी थी अपनी संगत में कोई जो औरों के लिए तरसते थे,
हम अपने खेल में दिन, धूप, बारिश, छाँव की ना सुने,
अपने सुकून में हम छतों पर भी सोए।
तो ऐसा क्यों है की हम भाग रहें हैं सबके पीछे?
ऐसा क्यों है की ख़ुद में वो शांति नहीं,
जब भोली भाली उम्र में ही हम अपने से संतुष्ट थे,
तो समझदारी आने से ये और बढ़ती क्यों नहीं?
हम समय समय पे ख़ुद को चुनते थे,
और जमाने को भी हमारा होना पड़ता था,
आज हम बस ख़ुद को चुनते नहीं,
फिर भी जमाना हमें अकेला कहता रहा।