कैसा है तुम्हारा विश्वास?

तुम्हारे मन में बस्ता कौन,
किसकी तुम पूजा करो।
किसकी पूजा को तुम धर्म कहो,
किसकी अर्चना को विश्वास कहो।
ये सब क्या तुम्हारा नहीं?
ये पराया कैसे होने लगा है?
कोई आ कर कह दे ये सब झूठ है,
इसपर क्रोध कैसे आने लगा है।
अरे राम जब थे तब क्या राम थे?
क्या प्रश्नन तब नहीं उठे?
किस रामायण में लिखा है कि राम
खुद पे उठे प्रश्नन से रूठ गए।
क्या कृष्ण को नहीं बांधा रस्सियों से गोकुल धाम ने,
सही गलत के अलावा कब चक्र चलाया भगवान ने।
ईसा मसीह को तुम्हीं लोगों ने चढ़ा दिया सूली पर,
कह दो उन्हें देवता नहीं माने तो छोर दिया तुम्हें प्रभु ने।
किस कुरान में तुम्हें कहा अल्लाह ने की जो मुस्लिम नहीं बन पाएगा,
मौत मरेगा वो जरूर जो दरगाह में चादर नहीं चढ़ायेगा।


कैसा है विश्वास तुम्हारा?
ये विद्रोह पे क्यूँ आता है,
तुम्हारे और तुम्हारे भगवान के बीच संसार कब से आता है।
क्या इतना ही है प्यार उससे की प्रश्नो से भयभीत हो।
हाथ जोड़ कर सर झुकाना, क्या बस इतनी ही भक्ति रखते हो?
क्या मिलता है हस कर किसी और के मंजर पे,
ये कैसी विजय है जिसपे दूसरों के आंसू बहे।
अरे कबसे ये समाज इस कदर नीच हुआ,
जो ना माने तुम्हारा विश्वास,
वो क्यूँ हिंसा का शिकार हुआ।

हर धर्म, संस्कृति सिखाती है मानव को की प्रश्नन करो,
ये तो नहीं कहता कोई भी, आओ मेरे आगे तुम गिरो।
ये जो है तुम्हारा विश्वास, ये कैसा है?
कोई कह दे अपने विश्वास की बात तो हिल जाता है?
आ कर क्रोध में तुम त्राहि करते हो?
सोचते हो ये जरूरी था, कैसा प्रेम तुम करते हो?
आके लोग तुम्हें तुम्हारे विश्वास के नाम पे लूटते हैं,
तुम भी अंधे हो, उसी झूठ पे तुम्हारे सर झूमते हैं।


अरे कच्चा है तुम्हारा मन, कमजोर है विश्वास,
मजबूत होता तो क्या अन्तर पड़ता मेरे यार।
तुम अगर सच में समझते उस धर्म को,
तुम अपना आंगन पहले ठीक करते,
बाद में धिक्कारते सारे जग को।
अगर होती सच्ची आस्था तो ना हिकारत से देखते दूसरे वर्ग को,
प्रश्नो पे मुस्करा कर,
उत्तर ढूंढते संग मिल कर।

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